चन्द्रमा अपना प्रकाश सारे जग में फैलाता है परन्तु अपना कलंक अपने अन्दर ही रखता है.उसी प्रकार सद व्यक्ति अपनी अच्छाइयों से दुसरों की मदद करता है तथा अपने अवगुणों को अपने अन्दर छिपाये रखता है.
(चित्र साभार गूगल) |
Saturday, March 6, 2010
एक विचार
Thursday, February 4, 2010
बदलता समय

महेश जी सरकारी कार्यालय में उच्च पद पर कार्यरत थे। वे भी आज के युग के अफ़सर थे एवं भ्रष्टाचार से घिरे हुए थे। उन्हीं के सेक्सन में मिश्रा जी भी कार्य करते थे, पर वे एक मामूली पद पर (चपरासी) थे। उनका पुत्र था सूरज जो एम.ए. तक पढ़ा था। उसी की चिंता मिश्रा जी को सता रही थी। इतनी कम आय में एम. ए. तक पढ़ाना कोई आसान बात नहीं थी। एक दिन उनके ही कार्यालय के लिए लिपिक पद के लिए विज्ञापन निकला। सूरज ने भी फ़ार्म भरा। लिखित परीक्षा हुई। सूरज ने लिखित परीक्षा उत्तीर्ण किया एवं सिर्फ़ इंटरव्यू ही शेष रह गया था।सहकर्मियों के कहने पर मिश्रा जी साहब के पास गए ,जिनपर इस पद को भरने की जिम्मेदारी थी ।वे साहब और कोई नहीं बल्कि महेश जी ही थे। मिश्रा जी ने हाथ जोड़कर उनसे आग्रह किया कि उनका पुत्र भी इंटरव्यू के लिए चुना गया है। “अगर आप उसे थोड़ा देख ले तो....” महेश जी ने उनकी बात को काटते ही सीधा कह दिया “2 लाख रूपये लगेंगे।” उनकी इस बात को सुनकर मिश्रा जी हक्के –बक्के रह गए। वे बिना कुछ कहे चुपचाप बाहर आ गए। कुछ दिन बाद जब नतीजा घोषित हुआ तो सूरज का नाम लिस्ट में नहीं था। मिश्रा जी मन मसोस कर रह गए।
कूछ दिन बाद खबर आई कि महेश जी भ्रष्टाचार के आरोप में रंगे हाथों पकड़े गए। यह खबर सुनकर मिश्रा जी भी स्तब्ध थे।
करीब 6 साल बाद महेश जी जेल से छूटे । अब उनकी नौकरी भी नहीं रही और न कोई पूछने वाला। जब वे घर लौटे तो उन्होंने देखा उनके पुत्र राज की उम्र भी नौकरी लायक हो गई है और वह किसी परीक्षा में बैठने की तैयारी कर रहा था। महेश जी ने उससे उस कार्यालय का नाम पूछा जहां वह परीक्षा देने जा रहा था।
शाम को महेश जी उस कार्यालय में गए एवं वहां के अधिकारी से हाथ पैर जोड़कर निवेदन किया कि उनके पुत्र को यह नौकरी किसी तरह मिल जाए । वो इसके लिए उन्हें नकद घूस देने को भी तैयार हो गए । उस नौजवान अधिकारी ने उन्हें उठाया और निश्चित होकर जाने को कहा।
नतीजे घोषित हुए, महेश जी के पुत्र का नाम एकदम ऊपर था । महेश जी खुशी से झूम उठे । दूसरे दिन किसी तरह घर के गहने बेचकर अधिकारी को पैसे देने पहुंचे तो उस अधिकारी ने इंकार करते हुए कहा --- “अंकल मुझे शर्मिंदा न करे । मैने कुछ नहीं किया ,ये तो आपके बेटे की मेहनत का नतीजा है जिसके कारण आज वह सफल हुआ। मनुष्य के अंदर ईमानदारी सबसे बड़ी चीज हेती है, और किसी असहाय की सहायता करना हमारी मानवता है। मेरे पिता ने मुझे ईमानदारी के रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी है।” उस युवक की बात सुनकर महेश जी शर्मिंदा हो गए। अंत में जब उस अधिकारी ने कहा कि मैं आपके ऑफिस के चपरासी मिश्रा जी का पुत्र हूं तो यह सुनकर महेश जी हक्के - बक्के रह गए।
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कूछ दिन बाद खबर आई कि महेश जी भ्रष्टाचार के आरोप में रंगे हाथों पकड़े गए। यह खबर सुनकर मिश्रा जी भी स्तब्ध थे।
करीब 6 साल बाद महेश जी जेल से छूटे । अब उनकी नौकरी भी नहीं रही और न कोई पूछने वाला। जब वे घर लौटे तो उन्होंने देखा उनके पुत्र राज की उम्र भी नौकरी लायक हो गई है और वह किसी परीक्षा में बैठने की तैयारी कर रहा था। महेश जी ने उससे उस कार्यालय का नाम पूछा जहां वह परीक्षा देने जा रहा था।
शाम को महेश जी उस कार्यालय में गए एवं वहां के अधिकारी से हाथ पैर जोड़कर निवेदन किया कि उनके पुत्र को यह नौकरी किसी तरह मिल जाए । वो इसके लिए उन्हें नकद घूस देने को भी तैयार हो गए । उस नौजवान अधिकारी ने उन्हें उठाया और निश्चित होकर जाने को कहा।
नतीजे घोषित हुए, महेश जी के पुत्र का नाम एकदम ऊपर था । महेश जी खुशी से झूम उठे । दूसरे दिन किसी तरह घर के गहने बेचकर अधिकारी को पैसे देने पहुंचे तो उस अधिकारी ने इंकार करते हुए कहा --- “अंकल मुझे शर्मिंदा न करे । मैने कुछ नहीं किया ,ये तो आपके बेटे की मेहनत का नतीजा है जिसके कारण आज वह सफल हुआ। मनुष्य के अंदर ईमानदारी सबसे बड़ी चीज हेती है, और किसी असहाय की सहायता करना हमारी मानवता है। मेरे पिता ने मुझे ईमानदारी के रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी है।” उस युवक की बात सुनकर महेश जी शर्मिंदा हो गए। अंत में जब उस अधिकारी ने कहा कि मैं आपके ऑफिस के चपरासी मिश्रा जी का पुत्र हूं तो यह सुनकर महेश जी हक्के - बक्के रह गए।
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Monday, January 11, 2010
अपने-पराए
रजत बाबू रिटायर हो गए थे। वे दिल्ली से अपने घर कलकत्ता आ रहे थे।ट्रेन का सफर था, और उन्हें ऊपर वाली सीट मिली थी। मगर उम्र के लिहाज से उनमें इतनी शक्ति न थी कि वे उपर चढ़कर रात को सो सकें। उन्हें यही चिंता खाए जा रही थी। पर खुदा का खैर था कि सामने बैठे एक नौजवान, जिसका नाम राजेश था, उससे रजत जी की परेशानी देखी न गई और विनम्रता से अपनी नीचे की सीट उनको दे दी। रजत बाबू को बड़ा ही आनंद आया उसकी ईमानदारी देखकर । रात हो गई , सभी नींद में थे पर रजत बाबू का मन राजेश की सह्दयता ने जीत लिया था। वे सोचने लगे कि उनका पुत्र भी राजेश की तरह होगा।
सुबह हुई, राजेश ने रजत जी को चाय एवं अपने घर से लाए खाने का समान दिया। मंजिल आ चुकी थी। सभी अपने समान लिए उतर गए। राजेश ने रजत जी को प्रणाम किया और अलविदा कहा। पर यह क्या, रजत बाबू को स्टेशन रिसीव करने घर से कोई नहीं आया। न बेटा न बहू ।पर उन्हें इससे दुख न हुआ।
घर पहुंचने पर भी परिवार द्वारा उत्साह एवं प्रेम का तनिक भी भाव न देखकर उनके मन की आशाएं एवं खुशियां मिट सी गई।वे घर में अपने को अकेला एवं मेहमान सा महसूस कर रहे थे, उनका एकमात्र सहारा उनकी पत्नी स्वर्ग सिधार चुकी थी। अपने पुत्र द्वारा नेगलेक्ट किए जाने के कारण उनका ह्रदय टूट सा गया था। रात हो गई थी ,पर रजत बाबू यही सोच रहे थे कि पराए भी कभी-कभी अपनों से ज्यादा अच्छे होते हैं।
*****
नव वर्ष की शुभकामनाएं । यह मेरी पहली कहानी है । अपने विचारों से अवश्य अवगत कराएं ।
सुबह हुई, राजेश ने रजत जी को चाय एवं अपने घर से लाए खाने का समान दिया। मंजिल आ चुकी थी। सभी अपने समान लिए उतर गए। राजेश ने रजत जी को प्रणाम किया और अलविदा कहा। पर यह क्या, रजत बाबू को स्टेशन रिसीव करने घर से कोई नहीं आया। न बेटा न बहू ।पर उन्हें इससे दुख न हुआ।
घर पहुंचने पर भी परिवार द्वारा उत्साह एवं प्रेम का तनिक भी भाव न देखकर उनके मन की आशाएं एवं खुशियां मिट सी गई।वे घर में अपने को अकेला एवं मेहमान सा महसूस कर रहे थे, उनका एकमात्र सहारा उनकी पत्नी स्वर्ग सिधार चुकी थी। अपने पुत्र द्वारा नेगलेक्ट किए जाने के कारण उनका ह्रदय टूट सा गया था। रात हो गई थी ,पर रजत बाबू यही सोच रहे थे कि पराए भी कभी-कभी अपनों से ज्यादा अच्छे होते हैं।
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नव वर्ष की शुभकामनाएं । यह मेरी पहली कहानी है । अपने विचारों से अवश्य अवगत कराएं ।
Saturday, November 21, 2009
जिन्दगी : एक कहानी
जिन्दगी- एक कहानी,
एक मूर्ख कहता चला जा रहा है,
और मैं भी एक मूर्ख, सुनता
सुन-सुन कर अच्छा भी लग रहा है
और बुरा भी, हूं खुश भी और दुखी भी
क्या अच्छा, क्या बुरा ? सब दोष है दोष दीमाग का,
गीत भी गूंज रहा है मन में एक –
आगे क्या होगा, आगे क्या होगा ?
दोस्तो विडंबना यह है –
कुछ क्षण बाद,
समाप्त हो जाएगी
जिन्दगी - एक कहानी ।
एक मूर्ख कहता चला जा रहा है,
और मैं भी एक मूर्ख, सुनता
सुन-सुन कर अच्छा भी लग रहा है
और बुरा भी, हूं खुश भी और दुखी भी
क्या अच्छा, क्या बुरा ? सब दोष है दोष दीमाग का,
गीत भी गूंज रहा है मन में एक –
आगे क्या होगा, आगे क्या होगा ?
दोस्तो विडंबना यह है –
कुछ क्षण बाद,
समाप्त हो जाएगी
जिन्दगी - एक कहानी ।
Thursday, November 19, 2009
हीरा
कूड़े के ढ़ेर पर लेटे
दो बच्चों को देखा ,
पेंसिल मुंह में डाले ,
किताब पढ़ रहे थे ।
सुना है, कीचड़ में ही
कमल खिलते हैं,
तो क्या,कूड़ों के ढ़ेर से ,
हीरे भी निकलते हैं ?
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