Tuesday, November 16, 2010

वह बादल हूं मैं.


वह बादल हूं मैं

जो आसमान में अकेला, अवारा है.

मेरे कोई पंख नहीं है

फ़िर भी मैं भटकता रहता हूं,

जरुरतमंदो की तलाश में.

कहीं कहीं भू ऐसे है

जहां है पर्याप्त जल

नहीं उनको मेरी आवश्यकता

वो क्या मेरे मह्तव को समझ सकता,

इसलिए जब कहीं दिख पडते है मुझे

फ़टी धरती, आकाश पर ठहरते नेत्र

उनकी

इच्छा पूरी करने के लिए

मैं बरस पडता हूं,

बरसने के लिए

लड पडता हूं.

मैं सोचता हूं- यहीं खत्म हो गई मेरी कहानी

पर बाद में पता चलता है-

भगवान ! मुझे भाप बनाकर

फ़िर ऊपर

बादल बनाकर

मुझे लोगो की सेवा के लिए देवदूतबना देता है.

मैं वह बादल हूं.

-मोहसिन

गूगल चित्र साभार

8 comments:

  1. उत्तम विचार , सही कहा

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  2. बधाई. आप कविता लिखने लगे हैं. जारी रखिये.
    कविता अच्छी लगी.

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  3. बेहतरीन प्रस्तुति।

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  4. अच्छी प्रस्तुति.

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  5. BhaiMohsin,
    Tankan ki kuchh ashhudhiyan hai.Posting ke pahale is par dhyan dena.Malik se kamana hai ki tum vastav mein Badal ban jao taki jis par chaho ek pal ke liye hi sahi baras to sakate ho.Kalpana ki udan bahut hi achhi lagi.Good post.

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  6. हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  7. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों....बेहतरीन भाव....खूबसूरत कविता...

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