सत्य के लिए हर वस्तु की बलि दी जा सकती है, किंतु सत्य की बलि किसी भी वस्तु के लिए
नहीं दी जा सकती।
** स्वामी विवेकानंद
सत्य के लिए हर वस्तु की बलि दी जा सकती है, किंतु सत्य की बलि किसी भी वस्तु के लिए
नहीं दी जा सकती।
** स्वामी विवेकानंद
१. भूल करना मनुष्य का स्वभाव है, की गई भूल को स्वीकार करना एवं वैसी भूल फ़िर न करने का प्रयास न करना वीर एवं शूर होने का प्रतीक है.
२. अंधा वह नहीं, जिसकी आंख नहीं है। अंधा वह है, जो अपना दोष छिपाता है.
** महात्मा गांधी
रिश्ता वह नहीं जो हम बनाते हैं,
रिश्ता वह है जिन्हें वक्त बनाता है.
कोई वह तो नहीं जिन्हें सिर्फ़ हम चाहते हैं,
कोइ वह भी है जो शायद हमें चाहता है.
(यह पंक्ति मुझे sms द्वारा एक मित्र से प्राप्त हुई थी जिसे मैंने आपके साथ बांटा है.)
गुरु और गोविन्द को एक समान समझिए, यह दोंनो एक ही हैं. ऐसा जानकर गुरु ने जो ग्यान उपदेश दिया है उसी के क्षेत्र में रहना चाहिए. जैसे ही गुरु का मिलन हो , दंड्वत बन्दगी करना चाहिए, परन्तु यदि ऐसा न हो तो गुरु का प्रतिक्षण ध्यान करना चाहिए. गुरु स्मरण से ध्यान पवित्र रहेगा.
कबीर
मुंशी प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के ही नहीं भारतीय साहित्य के बहुत बडे लेखक है. इनका जन्म ३१ जुलाई १८८० में वाराणसी जिले के लमही नामक ग्राम में हुआ. इनका वास्तविक नाम धनपतराय था. शिक्षा काल में इन्होंने उर्दू के साथ हिन्दी का भी अध्ययन किया. आर्थिक अवस्था खराब होने के कारण कुछ वर्षो तक अध्यापक रहे. फ़िर शिक्षा विभाग में डिप्टी इंस्पेक्टर हो गए. असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण इन्होंने नौकरी त्याग दी. आजीवन साहित्य सेवा करते रहे.
प्रेमचंद की पहली कहानी “संसार का सबसे अनमोल रत्न” है. इनकी कहानी संग्रह “सोज़ेवतन” को अंग्रेजो ने जब्त कर लिया था. ये उर्दू में नवाबराय के नाम से लिखा करते थे. इनकी कहानियों का संग्रह मानसरोवर नाम खंड में है. जिसमें ३०० से अधिक कहानियां है.
प्रेमचंद उपन्यास के सम्राट कहलाते हैं. उनका उपन्यास “गोदान” पूरे भारत का महान उपन्यास है. जो किसान जीवन के त्रासदी को व्यक्त करता है. इसके अलावा “गबन” , “सेवासदन” , “कायाकल्प” आदि उनके प्रमुख उपन्यास है.
इसके अलावा प्रेमचंद ने ३ नाटक लिखे “कर्बला”, “संग्राम”, “प्रेम की वेदी”.
साहित्यिक निबंध “कुछ विचार” नाम से प्रकाशित हुआ. इन्होंने सरल , सीधी, मुहावरेदार भाषा का प्रयोग किया. शुरु से अंत तक यथार्थवादी रहे. “बूढी काकी”, “ईदगाह” लिखने वाला वह कलाकार सन १९३६ में हमें छोडकर चला गया.
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साथ ही आप सभी को मेरी तरफ़ से दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं
(चित्र साभार गूगल)