वह बादल हूं मैं
जो आसमान में अकेला, अवारा है.
मेरे कोई पंख नहीं है
फ़िर भी मैं भटकता रहता हूं,
जरुरतमंदो की तलाश में.
कहीं कहीं भू ऐसे है
जहां है पर्याप्त जल
नहीं उनको मेरी आवश्यकता
वो क्या मेरे मह्तव को समझ सकता,
इसलिए जब कहीं दिख पडते है मुझे
फ़टी धरती, आकाश पर ठहरते नेत्र
उनकी
इच्छा पूरी करने के लिए
मैं बरस पडता हूं,
बरसने के लिए
लड पडता हूं.
मैं सोचता हूं- यहीं खत्म हो गई मेरी कहानी
पर बाद में पता चलता है-
भगवान ! मुझे भाप बनाकर
फ़िर ऊपर
बादल बनाकर
मुझे लोगो की सेवा के लिए “देवदूत” बना देता है.
मैं वह बादल हूं.
-मोहसिन
